बुढ़ापा एक सच- सबका आता है

बुढ़ापा इंसान से कहता है कि नई पीढ़ी को अनुभव बांटों ताकि वे कड़वे-मीठे का भेद जान सकें। बुढ़ापा चाहता है कि आने वाले कल के लोग वे सब न सहें जिन्हें उसने सहा है। वाकई बुढ़ापा फ़िक्र करता है सबकी। वह सलामती चाहता है हर किसी की। उसे दर्द होता है जब किसी अपने को चोट पहुंचती है। उसे चाहें किसी हाल में रहना पड़े, दुख सहना पड़े, वह हमेशा अपने बारे में नहीं सोचता। वह दूसरों का दर्द समेटने की ख्वाहिश रखता है। यह जिंदगी का सच है। हम सच का सामना असल में बुढ़ापे में ही करते हैं। जीवन की सच्चाई वृद्धावस्था में छिपी है। 
बुढ़ापा एक सच


जो लोग बूढ़े नहीं हुए, उन्हें मालूम होना चाहिए कि बुढ़ापा अपने में इतना कुछ समेट चुका होता है कि वह संपूर्ण जीवन की बारीकियों का निचोड़ हो जाता है।’ बुढ़ापा, जिंदगी का एक सच है, या यु कहे के एक डरावना सच है। सच में बुढ़ापा जिंदगी का एसा पड़ाव है जो सबकी जिंदगी में आता है.... चाहे कोई कितना ही खुबसूरत हो, चाहे कितना ही घमंडी हो बुढ़ापा सबको याद दिलाता है की वास्तव में हम क्या है.. क्योकि बुढ़ापे में पैसा, शरीर, दिमाग कुछ साथ नहीं देते यहाँ तक कि अपने भी साथ नहीं देते... कुछ लोग अपनी खूबसूरती पर बहुत अभिमान करते है... कुछ अपने पैसे और अपने रुतबे का अभिमान करते है... शायद ये लोग सोचते हो कि इनके जिंदगी में कभी बुढ़ापा नहीं आएगा पर ये जिंदगी का एक सच है इससे भाग कर आप इससे दूर नहीं जा सकते इसका आना निश्चित है... "हम सभी को ये ध्यान रखना चाहिए की समय कभी भी एक जैसा नहीं होता... "मृत्यु जिंदगी का दूसरा कड़वा सच है जब आप शमशान में होते है तो सच में खुद के साथ होते है.. आप और सिर्फ आप होते है वहा आपके सिवा और कोई नहीं होता और यही बात हमेशा हमे याद रखनी चहिये..."!!

जब समय अच्छा हो तो घमंड नहीं करना और किसी पर ज्यादती नहीं करना और जब समय ख़राब हो तो भी ज्यादा परेशान नहीं होना और अपना विवेक सजग रखना, जाग्रत रखना ही सबसे अच्छी बात है... "जिंदगी के उस सच को बार बार याद करने के लिए... हम सबको ये याद रखना चाहिए कि वक़्त ही सबसे बलवान है.... चाहे कितना ही नाम हो शोहरत हो बुढ़ापे में तो शरीर ही साथ छोड़ देता है तो फिर इन बाकि चीजों से क्या अपेक्षा करना.... किसी भी रिश्ते में त्याग यानी कुर्बानी का अपना ही मजा है। यह भावना रिश्ते की हर कड़ी पर भारी पड़ती है। रिश्तों में कुर्बानी एक ऐसी लहर के समान है जो नकारात्मक सोच की छोटी-बड़ी सभी घास-फूस को बहा ले जाती है।


 त्याग की छन्नी में नफरत, बदला, प्रतिस्पर्द्धा,एकाधिकार, नियंत्रण, स्वामित्व जैसे कंकड़-पत्थर अपने आप छन जाते हैं। त्याग की भावना एक अमृत के समान है जो मुश्किल में नया जीवनदान देता है। हर कठिन परिस्थिति से पार उतरने का रास्ता बताता है। आपके पास थोड़ा होते हुए भी परिपूर्णता का अहसास दिलाता है। आपके पास कुछ नहीं होते हुए भी आप दया मांगने वाले की नहीं बल्कि दया करने वालों की श्रेणी में आ जाते हैं।

 मन की गहराई से निकली ऐसी भावना से त्याग करके आपको कुछ खोने का नहीं बल्कि पाने का अहसास होता है जब माता-पिता बच्चों को मन से प्रेम करते हैं तो वे अपने हिस्से का न जाने कितना सुख त्यागते हैं। यह कुर्बानी कुछ पाने की आशा में नहीं की जाती है बल्कि उसे सुखी और खुद से बेहतर देखने की चाहत में की जाती है। बच्चों के लिए यह भावना कुदरती होती है पर जहां सच्चा प्यार का अहसास जगा हो वहां भी बहुत हद तक त्याग का स्वरूप वैसा ही हो जाता है। वहां छोटे-बड़े कलह की गुंजाइश नहीं रह जाती है। दोनों ओर भरोसे की भावना अपनी चरम बिंदु पर पहुंच जाती है।
बुढ़ापा हर किसी का आता है

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